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April 4, 2020
तुम्हें कुछ बताना रह गया समिधा। शायद मैं बताना भूल गई, या शायद मैंने सोच लिया कि अभी हमारे पास काफ़ी वक़्त है। तुमसे कहना था कि तुम्हारी कविता जो तुमने माध्यम में अपनी मीठी आवाज़ में गुनगुनाई थी, उसकी दो पंक्तियां मेरे दिल में रह सी गई हैं: “पर पुणे शहर है ये, यहाँ...
जिंदगी जैसी भी थी अच्छी थी, बुरी थी डोर तो  तुम्हारे ही हाथों थी तुम चाहतीं तो उस डोर की मदद से मीलों दूर छलांग लगती तुम चाहतीं तो उस डोर का झूला बनाकर जिंदगी के मज़े लेतीं मगर तुमने वो डोर ही काट दी न जाने ऐसा क्या हुआ जो तुम हमसे इतना रूठ...
“What do you think of Ambedkar, sir?” She had asked, As I was fumbling with my lecture notes. It is hard to be asked such when one is trying to kneel. Your knees pain that little more when you try to look up to the sky.   “Ambedkar is a sea”, I must have said...
This is the first time I am trying to write in Hindi, because I know Samidha would appreciate it. She would say, Ma’am koshish to kijiye. This is for you, my dear. फूलों सी नाज़ुक थी तुम, लोहे सी सख़्त भी थी। हंसी तुम्हारी झरनों जैसी क्यूं आज फिर मुरझाई सी? तुम्हें मैं क्या ही...
Itni baatein hai man me aaj Par zabaan pe kuch aate nahi Mai shaant kaise reh loon Ye yaadein dil se jaate nahi Mai nahi chahta ke hum kuch bhule Dard zyada ho to hum ro le Magar kuch bhi na bhule Pata hai kyu? Aapne chap chore hai aise Gum raaston ko more hai...
I never knew you. But I wish I did. I wish I could listen to your stories. I wish I could appreciate you. I wish I could just be there for you. But all I can wish for you now, is happiness. I know that your smile has already lit up the world where you...